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जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर पार्ट 1

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जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर:- इनकी शासन अवधि 27 जनवरी 1556 से 29 अक्टूबर 1605 राज्याभिषेक 14 फरवरी 1556 इनके पूर्वर्ती शासक हेमू और उत्तर आवर्ती जहांगीर इनका जन्म 15 अक्टूबर 1542 अमरकोट किला सिंह में हुआ इनका निधन 27 अक्टूबर 1605 फतेहपुर सीकरी आगरा रामाधीन की विशेषता बाद सिकंदरा आगरा में इनकी जीवनसंगिनी रुकैया बेगम साहिबा सलीमा सुल्तान बेगम साहिबा और मरियम उज जमानी बेगम साहिबा इनका घराना तैमूर मुगल पिता हुमायूं माता नवाब हमीदा बानो बेगम साहिबा 15 अक्टूबर 1542 से 27 अक्टूबर 1605 तैमूरी वंशावली के मुगल वंश का तीसरा शासक अकबर था अकबर को अकबर ए आजम अर्थात अकबर महान शहंशाह अकबर महाबली शहंशाह के नाम से भी जाना जाता है, सम्राट अकबर मुगल साम्राज्य के संस्थापक जहीरूद्दीन मुहम्मद बाबर का पौत्र और नसीरुद्दीन हुमायूं एवं हमीदा बानो का पुत्र था  , बाबर का वंश तैमूर और मंगोल नेता चंगेज खान से संबंधित था अर्थात उस के वंशज तैमूर लंग के खानदान से थे और मातृ पक्ष का संबंध चंगेज खान से था , अकबर के शासन के अंत तक 1605 में मुगल साम्राज्य में उत्तरी और मध्य भारत के अधिकांश भाग सम्मिलित थे और उस समय के सर्वाधिक शक्तिशाली साम्राज्य में से एक थे ,अकबर एक एसा शासक जिसे हिंदू मुस्लिम दोनों वर्गों का बराबर प्यार और सम्मान मिला ,उसने हिंदू मुस्लिम संप्रदायों के बीच की दूरियां कम कर दी, उसने दीन ए इलाही नामक धर्म की स्थापना की , उसका दरबार सबके लिए हर समय खुला रहता था उस के दरबार में मुस्लिम सरदारों की अपेक्षा हिंदू सरदार अधिक थे , अकबर ने हिंदुओं पर लगने वाला जजिया  ही नहीं समाप्त किया बल्कि वो कार्य किए जिनके कारण हिंदू और मुस्लिम दोनों उसके प्रशंसक बने ,  उसने शेरशाह सूरी के आक्रमण बिल्कुल बंद करवा दिए थे, साथ ही पानीपत के युद्ध में घोषित हिंदू राजा को पराजित किया, अपने साम्राज्य के गठन करने और उत्तरी और मध्य भारत के सभी क्षेत्रों को एक छत्र अधिकार में लाने में अकबर को दो दशक लग गए,  उसका प्रभाव लगभग पूरे भारतीय उपमहाद्वीप था, और इस क्षेत्र के एक बड़े भू भाग पर सम्राट के रूप में शासन किया ,सम्राट के रूप में अकबर ने शक्तिशाली और बहुत हिंदू राजपूत राजाओं से राजनयिक संबंध बनाए ,और उनके यहां विवाह भी किए, अकबर के शासन का प्रभाव देश की कला एवं संस्कृति पर भी पड़ा, उसने चित्रकारी आदि ललित कलाओं में काफी रूचि दिखाई, और उसके प्रसाद की भित्तियां सुंदर चित्रों व नमूनों से भरी पड़ी थी ,मुगल चित्रकारी का विकास करने के साथ साथ ही उसने यूरोपीय शैली का भी स्वागत किया ,उसे साहित्य में भी रुचि थी, और उसने अनेक संस्कृत पांडुलिपियों व ग्रंथों का फारसी में तथा फारसी ग्रंथों का संस्कृत में वह हिंदी में अनुवाद भी करवाया था, अनेक फारसी संस्कृत से जुड़े चित्रों को अपने दरबार की दीवारों पर भी बनवाया, अपने आरंभिक शासनकाल में अकबर की हिंदुओं के प्रति सहिष्णुता नहीं थी, किंतु समय के साथ-सथ उसने अपने आप को बदला और हिंदुओं सहित अन्य धर्मों में बहुत रुचि दिखाई, उसने हिंदू राजपूत राजकुमारियों से वैवाहिक संबंध भी बनाए अकबर के दरबार में अनेक हिंदू दरबारी सैन्य अधिकारी व सामंत थे ,उसने धार्मिक चर्चा वाद-विवाद कार्यक्रमों की अनोखी श्रृंखला आरंभ की थी जिसमें मुस्लिम  लोगों की जैन सिख हिंदू चार्वाक नास्तिक यहूदी पुर्तगाली एवं कैथोलिक ईसाई धर्म शास्त्रों से चर्चाएं हुआ करती थी,  उसके मन में इन धार्मिक नेताओं के प्रति आदर भाव था , जिस पर उसकी निजी धार्मिक भावनाओं का किंचित भी प्रभाव नहीं पड़ता था, उसने आगे चलकर एक नया धर्म दीन ए इलाही की भी स्थापना की, जिसमें विश्व के सभी प्रधान धर्मों की नीतियों व शिक्षाओं का समावेश था, दुर्भाग्यवश धर्म अकबर की मृत्यु के साथ ही समाप्त होता चला गया, इतने बड़े सम्राट की मृत्यु होने पर उसकी अंत्येष्टि बिना किसी संस्कार के जल्दी ही कर दी गई, परंपरा अनुसार दुर्ग में दीवार तोड़कर एक मार्ग बनवाया गया तथा उसका शव चुपचाप सिकंदरा के मकबरे में दफना दिया गया l अकबर का जन्म पूर्णिमा के दिन हुआ था इसलिए उसका नाम बदरुद्दीन मोहम्मद अकबर रखा गया था, बद्र का अर्थ होता है पूर्ण चंद्रमा और अकबर उनके नाना शेख अली अकबर जामी के नाम से लिया गया था, कहा जाता है कि काबुल पर विजय मिलने के बाद उनके पिता हुमायूं ने बुरी नजर से बचने के लिए अकबर की जन्म तिथि एवं नाम बदल दिए थे, किवदंती अभी है कि भारत की जनता ने उनके सफल एवं कुशल शासन के लिए अकबर नाम से सम्मानित किया था, अरबी भाषा में अखबार शब्द का अर्थ महान या बड़ा होता है, आरंभिक जीवन :-अकबर का जन्म राजपूत शासक राणा अमर साल के महल उमेरकोट सिंध वर्तमान पाकिस्तान में 23 नवंबर 1542 हिजरी अनुसार रिजर्व 49 के चौथे दिन हुआ था , यहां बादशाह हुमायूं अपनी हाल की विवाहित बेगम हमीदा बानो बेगम के साथ शरण लिए हुए थे, इस पुत्र का नाम हुमायूं ने एक बार सपने में सुनाई दिए गए, अंसार जलालुद्दीन मोहम्मद रखा, बाबर का वंश तैमुर था , और मातृ पक्ष का संबंध चंगेज खान से था,  इस प्रकार की धमनियों में एशिया की दो प्रजातियों तुर्क और मंगोलों के रक्षण था, हुमायूं को पश्तून नेता शेरशाह सूरी के कारण भारत में अज्ञातवास बिताना पड़ रहा था, किंतु अपने संगअकबर को  नहीं लेजा सका  वरना रीवा वर्तमान मध्यप्रदेश के राज्य के  ग्राम मुकुंदपुर में छोड़ दिया था  , अकबर की वहां के राजकुमार राम सिंह प्रथम से जो आगे चलकर रीवा का राजा बना दोस्ती  हो गई थी , यह एक साथ ही पले  और बड़े और आजीवन मित्र रहे ,कालांतर में अकबर सफावी साम्राज्य वर्तमान अफगानिस्तान का भाग में अपने एक चाचा  के यहां रहने लगा, कुछ दिनों कंधार में और फिर 1545 में काबुल में रहा, हूं कि अपने छोटे भाइयों से बराबरी ही रही इसलिए चाचा लोगों के यहां अकबर की स्थिति बंदी से कुछ ही अच्छी थी, यद्यपि उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे , और शायद दुलार प्यार कुछ ज्यादा ही होता था  ,किंतु अखबार पढ़ लिख नहीं सका, वह केवल सैन्य शिक्षा ले सका,  उसका काफी समय आखेट दौड़ती खेलने में  बीता तथा शिक्षा में उसकी रुचि नहीं रही, जब तक अकबर 8 वर्ष का हुआ जन्म से लेकर अब तक उसके सभी वर्ष भारी अस्थिरता में निकले थे, जिसके कारण उसकी शिक्षा-दीक्षा का सही प्रबंधन नहीं हो पाया था, अकबर की शिक्षा दीक्षा शुरू की जाएगी शिक्षा प्रारंभ करने के लिए काबुल में एक आयोजन किया ,मौके पर अकबर  के खो जाने पर वह समारोह संपन्न हुआ, मिर्ज़ामुईनुद्दीन अब्राहिम को अकबर का शिक्षक नियुक्त किया गया था मगरअहसमुद्दीन अक्षम सिद्ध हुए, तब यह कार्य पहले मौलाना बाम जीत को सौंपा गया था, मगर जब उन्हें भी सफलता नहीं मिली तो मौलाना अब्दुल कादिर को यह काम सौंपा गया ,मगर कोई भी शिक्षक अकबर को शिक्षित करने में सफल ना हुआ ,असल में पढ़ने लिखने में अकबर की रुचि नहीं थी ,उसकी रुचि कबूतर बाजी, घुड़सवारी ,और कुत्ते पालने में अधिक थी, किंतु ज्ञान उपार्जन में उसकी रुचि सदा से न थी,  कहा जाता है कि जब वह सोने जाता था, एक व्यक्ति उसे कुछ पढ़ा कर सुनाता था, समय के साथ-साथ अकबर एक परिपक्व और समझदार शासक के रूप में उभरा, जिसे कला स्थापत्य संगीत और साहित्य में गहरी रूचि रही राज तिलक:- शेरशाह सूरी के पुत्र इस्लाम शाह के उत्तराधिकारी के विवादों से उत्पन्न अराजकता का लाभ उठाकर हुमायूं ने 1555 में दिल्ली पर पुनः अधिकार कर लिया, इसमें उसकी सेना में एक अच्छा भाग फारसी सहयोगी तामस प्रथम का रहा, इसके कुछ माह बाद ही 48 वर्ष की आयु में ही हुमायूं का आकस्मिक निधन हो गया, तब अकबर के संरक्षक बैरम खान एवं राज्य के हित में, इस मृत्यु को कुछ समय के लिए छुपाए रखा, और अकबर को उत्तराधिकार हेतु तैयार किया ,फरवरी 1556 को अकबर का राजतिलक हुआ, यह सब मुगल साम्राज्य से दिल्ली की गद्दी पर अधिकार की वापसी के लिए सिकंदर शाह सूरी से चल रहे युद्ध के दौरान ही हुआ, 13 वर्षीय अकबर का  पंजाब में सुनहरे वस्त्र तथा एक गहरे रंग की पगड़ी में एक नवनिर्मित मंच पर राजतिलक हुआ,  यह मंच आज भी बना हुआ है ,,उसे फारसी भाषा में सम्राट के लिए शब्द शहंशाह से पुकारा गया, वयस्क होने तक उसका राज्य बैरम खां के संरक्षण में चला,                                                                                         राज्य का विस्तार:– खोए हुए राज्य को प्राप्त करने के लिए अकबर के पिता हुमायूं के अनवरत प्रयत्न अंततः सफल हुए,  और वह 1755 में हिंदुस्तान पहुंच सका किंतु अगले ही वर्ष 1556 में राजधानी दिल्ली में उसकी मृत्यु हो गई,  और गुरदासपुर में  14 वर्ष की आयु में अकबर का राजतिलक हुआ अकबर का संरक्षक बैरम खान को नियुक्त किया गया, जिसका प्रभाव उस पर 1560 तक रहा,तत्कालीन मुगल राज्य केवल काबुल से दिल्ली तक फैला हुआ था, इसके साथ ही अनेक समस्याएं भी सिर उठाए खड़ी थी, 1563 में शमसुद्दीन खान की हत्या पर उभर जन आक्रोश 1565 के बीच उजबेक विद्रोह और 1566 67 में मिर्जा भाइयों का विद्रोह भी था किंतु अकबर ने बड़ी कुशलता से इन समस्याओं को हल कर लिया, अपनी कल्पनाशीलता से उसने अपने सामंतों की संख्या बढ़ाई , इसी बीच 1566 में महामन्गा के   बनवाए मदरसे, वर्तमान पुराने किले परिसर में से शहर लौटते हुए अकबर पर तीर से एक जानलेवा हमला हुआ, जिसे अकबर ने अपनी फुर्ती से बचा लिया हालांकि उसकी बांह में गहरा घाव हुआ, इस घटना के बाद अकबर की प्रशासन शैली में कुछ बदलाव आया, जिसके तहत उसके शासन की पूर्ण बागडोर अपने हाथों में ले ली, इसके फौरन बाद ही हेमू के नेतृत्व में अफगान सेना पुनः संगठित होकर उसके सम्मुख चुनौती बनकर खड़ी हुई थी, अपने शासन के आरंभिक काल में ही अकबर या समझ गया किस सूर्यवंश को समाप्त किए बिना वह चैन से शासन नहीं कर सकेगा ,इसलिए वह सूर्य वंश के सबसे शक्तिशाली शासक सिकंदर शाह सूरी पर आक्रमण करने पंजाब पहुंचा, दिल्ली की सत्ता बदल अकबर के समय मुगल साम्राज्य दिल्ली का शासन उसने मुगल सेनापति तार दी बैग खान को सौंप दिया, सिकंदर शाह सूरी अकबर के लिए बहुत बड़ा प्रतिरोध साबित नहीं हुआ, कुछ प्रदेशों में तो अकबर के पहुंचने से ही पहले उसकी सेना पीछे हट जाती थी ,अकबर की अनुपस्थिति में हेमू विक्रमादित्य ने दिल्ली और आगरा पर आक्रमण कर विजय प्राप्त की, अक्टूबर 1556 को हेमू  भारत का महाराजा घोषित कर दिया , इसी के साथ दिल्ली में हिंदू राज्य की स्थापना हुई,                                                                                              सत्ता की वापसी:- दिल्ली की पराजय का समाचार जब अकबर को मिला तो उसने तुरंत बैरम खान से परामर्श करके दिल्ली की तरफ कूच करने का इरादा बना लिया,  अकबर के सलाहकारों ने काबुल की शरण में जाने की सलाह दी ,अकबर और हेमू की सेना के बीच पानीपत में युद्ध हुआ ,या युद्ध पानीपत का युद्ध नाम से प्रसिद्ध है, संख्या में कम होते हुए भी अकबर ने इस युद्ध में विजय प्राप्त की, इस जीत से  अकबर को 15 हाथी मिले जो  सिकंदर शाह सूरी के विरुद्ध काम आए, सिकंदर शाह सूरी ने आत्मसमर्पण कर दिया, और अकबर ने उसे प्राण दान दे दिया , और दिल्ली पर अधिकार जमाने के बाद अकबर अपने राज्य विस्तार करना शुरू कर दिया, और मालवा को 1562 में गुजरात को 1572 में पश्चिम बंगाल को 1574 में काबुल को 1581 में कश्मीर को 15 86 में और खानदेश को 1601 में मुगल साम्राज्य के अधीन कर लिया अकबर ने इन राज्यों में 11 राज्यपाल नियुक्त किया  , वह  नहीं चाहता था कि मुगल साम्राज्य का केंद्र दिल्ली जैसे शहर में हो इसलिए उसने यह निर्णय किया कि मुगल राजधानी को फतेहपुर सीकरी ले जाया जाए, जो साम्राज्य के मध्य में थी ,कुछ ही समय के बाद अकबर को राजधानी फतेहपुर सीकरी से हटानी पड़ी कहा जाता है कि पानी की कमी इसका प्रमुख कारण था , फतेहपुर सीकरी के बाद एक दरबार बनाया जो कि राज्य भर में घूमता रहता था इस प्रकार साम्राज्य के सभी कोणों पर उचित ध्यान देना संभव हुआ ,1585 में उत्तर पश्चिम राज्य के सुचारू राज पालन के लिए अकबर ने लाहौर को राजधानी बनाया उसने वापस आगरा को राजधानी बनाया और शासन संभाला, प्रशासन मुगल संरक्षक बैरम खां को निकाल बाहर किया, अपने हाथों में सत्ता ली ,……….क्रमशः……………………..

Amar Deep Pathik

Amar Deep Pathik

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